1857 के स्वतंत्रता संग्राम में उत्तर प्रदेश के दलित सेनानियों का योगदान
मुख्य शब्द – दलित, आरक्षण, अक्षांश, भौगोलिक विस्तार, पुष्पन पल्लवन, घुमन्तू, डिप्रेस्ड, अधर्मी, कोर्ट मार्शल ।
परिचय
उत्तर प्रदेश भारत का एक विशिष्ट राज्य हैं। प्राचीन समय मे "ब्रह्मर्षि-देश" के नाम से ज्ञात इस राज्य को जनवरी 1950 ई0 में "उत्तर प्रदेश" का नाम प्राप्त हुआ था। इसका वर्तमान भौगोलिक विस्तार-23 उत्तरी अक्षांश से 47० उत्तरी अक्षांश तथा 67० पूर्वी देशान्तर से 95०' 25 पूर्वी देशान्तर तक हैं।गंगा-यमुना दोआब में अवस्थित इस हिन्दी भाषी राज्य को उत्तर वैदिक काल मे ख्याति प्राप्त रही हैं। यहाँ "काशी, कोसल एवं वत्स" जैसे महाजनपद एवं "श्रावस्ती, साकेत, कौशाम्बी एवं वाराणसी" जैसे बुद्धकालीन महानगर स्थित थे। गुप्त शासकों, सम्राट, हर्ष, तुर्को, मुगलो एवं अंग्रेजों सभी ने इसके महत्त्व को समझा था। यही पर जैन,बौद्ध एवं सनातन हिन्दू धर्म का पुष्पन पल्लवन हुआ था। यहाँ सारनाथ, कुशीनगर, पावा,अयोध्या, प्रयाग, मथुरा, वृन्दावन, देवाशरीफ, फतेहपुर सीकरी जैसे तीर्थ स्थल एवं वशिष्ठ, विश्वामित्र, एकलव्य तथा कबीरदास, सूरदास एवं तुलसीदास जैसी विभूतियाँ हुई है। यहां की सामाजिक व्यवस्था वर्ण व्यवस्था से प्रभावित हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य को छोड़कर शूद्र की स्थिति निम्न मानी जाती थी। कालांतर में अनेक वर्णसंकर जातियों के सम्मिलन से निम्न वर्ग की जनसंख्या निरंतर बढती गई एवं चाण्डाल, डोम, हादी इत्यादि की अस्पृश्यो में गणना होने लगी। आधुनिक काल तक आते-आते समाज का स्पष्टतः उच्च व निम्न वर्ग में विभाजन हो चुका था। निम्न वर्गीय जातियों को ही प्रायः दलित जातियों के रूप में अभिहीत किया गया हैं।
"दलित श्ब्द " अंग्रेजी के 'डिप्रेस्ड' का समानार्थी है। जिसका अर्थ दबाया या नीचे किया गया होता हैं। अभिप्राय कि 'सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक एवं धार्मिक दृष्टिकोण से जो जातियां पीछे रह गई और जिनका समुचित विकास न हो सका, वे दलित जातियां मानी गई है। डॉ0 माता प्रसाद जी ने 2007 में दलित जातियों में अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों, घुमन्तू एवं बंजारा जातियों तथा पिछड़ी एवं अत्यधिक पिछड़ी जातियों को सम्मिलित किया है। इस प्रकार ये लगभग 50% भारतीय जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करती हैं।
उद्देश्य:
I. उत्तर
प्रदेश की तत्कालीन सामाजिक,आर्थिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक
परिस्थितियों का विश्लेषण करना।
ii. 1857 ई0 के स्वतंत्रता
संग्राम में उत्तर प्रदेश के दलितों के
योगदान पर प्रकाश डालना।
iii. उत्तर प्रदेश के दलितों की भूमिका का जातिगत,धार्मिक
एवं लैंगिक इत्यादि विभिन्न आधारों पर तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करना।
vi. उत्तर प्रदेश के दलितों पर तत्कालीन राजनीतिक एवं राष्ट्रीय
घटनाओं के प्रभाव का अध्ययन करना।
vii. उत्तर प्रदेश के दलितों पर अंग्रेजी नीतियों एवं कूटनीतिक
चालो के प्रभाव का मूल्यांकन करना।
भारत मे सदियों से जाति-प्रथा,छुआ-छूत,अश्पृश्यता, असंगठन,तथा पारस्परिक द्वेष-भाव के परिणाम स्वरूप विदेशियों ने यहां राज किया। सेठ अमीरचंद और मीर जाफर जैसे देश द्रोहियों ने भारत को गुलाम बनाये रखने में अंग्रेजो का साथ दिया। दलित(अछूत) वर्ग ने अपनी दीन-हीन दशा में जीवन यापन करते हुए भी मातृभूमि के लिए कभी सौदा नही किया। ऐसा एक भी रूप अछूत वर्ग पर कभी नही लगा। समस्त भारतीय समाज के साथ वह भी पूर्ववत दासता भरी जिन्दगी व्यतीत करता रहा है। देश मे जब भी आवश्यकता पड़ी इस वर्ग ने आगे बढ़कर देशहित में अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया।
मई 1857 से प्रारम्भ होकर 1858 ई0 तक चले भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में कितने भारतीय शहीद हुए। इसकी गणना करना आसान नही है। लेकिन हमारा दुर्भाग्य यह है, कि स्वाधीन भारत मे अनेक सरकारों के दौर आते रहे,और जाते भी रहे,परन्तु कोई सफल प्रयास इस और नही हुआ। लगभग 16 महीनों तक चले इस विद्रोह के बारे में कार्ल मार्क्स और एंजिल्स ने 28 लेख लिखे। कार्ल मार्क्स ने 15 जुलाई,1857 को "न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून" में लिखा था कि "यह पहली बार हुआ है कि देशी फौजो ने अपने यूरोपीय अफसरों को मार डाला है।" इस महासंग्राम की पहली और सबसे बड़ी विशेषता यह थी,कि उत्तर प्रदेश की दलित-दमित जनता ने अंगेजो से लोहा लिया,वह भी आमने-सामने। मैंने अपने लेख में उत्तर प्रदेश के प्रमुख दलित सेनानियों को शामिल करने की कोशिश की है जिन्होंने भारत के इस प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
मातादीन(भंगी)
भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में मातादीन भंगी का विशेष महत्व है, अगर मंगल पाण्डेय इस क्रांति के शोला थे तो मातादीन इसकी प्रथम चिंगारी 10 मई 1857 ई0 की क्रांति की मशाल कैसे जल उठी। इस बात को सोचते ही हमारे मन मे एक प्रश्न आता है कि आखिर वह कौन सी ऐसी बात थी जिस कारण इस क्रांति का शुभारंभ हुआ। इसकी पृष्ठभूमि में एक बड़ा ही रोचक तथ्य है जिस ओर बहुत ही काम लेखकों ने अपनी लेखनी को चलाया। दरअसल बात यह है कि बैरकपुर छावनी, जो कलकत्ता से 16 मील दूर थी। इस क्रांति के अनुसंधान से जो तथ्य प्रकाश में आये है वे इस प्रकार है। इस छावनी में कारतूस बनाने का एक कारखाना था । जिसमें काम करने वाले बहुत से व्यक्ति सदियों से अछूत समझी जाने समुदाय से थे। एक दिन इसी अछूत जाति के एक व्यक्ति को प्यास लगी। उन्होंने एक सैनिक से पानी पीने के लिये लौट मांगा। वह सैनिक एक कर्मकांडी ब्राह्मण था। उन्होंने उस व्यक्ति को यह समझकर लौटा नही दिया कि वह एक नीच जाति का अछूत व्यक्ति है। लौटा न मिलने के कारण प्यासे कर्मचारी को अपमान सा लगा। उसने उस ब्राह्मण सैनिक से कहा--"बड़ा आया है ब्राह्मण का बेटा ।,जिन कारतूसों का तुम उपयोग करते को उन पर गाय और सुअर की चर्बी लगाई जाती है और उन्हें तुम अपने दाँतो से तोड़कर बंदूक में भरते हो। उस समय तुम्हारा ब्राह्मणत्व और धर्म कहाँ चला जाता है। क्या किसी प्यासे व्यक्ति को पानी पिलाने के लिये लौटा देने से तुम्हारा धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। धिक्कार है तुम्हारे ब्राह्मणत्व को।" यह बात सुनकर ब्राह्मण सैनिक चौंक गया । वह अछूत व्यक्ति कोई और नही था मातादीन भंगी था। भारतीय सिपाहियो की आँखे खोल दी तथा क्रांति के लिए प्रथम चिंगारी इस छवानी मे फेंक दी। वस क्या था? पूरी छवानी में मातादीन की बात की चर्चा आग की तरह फैल गई। देकते-देखते क्रांति की इस ज्वाला में मंगल पान्डेय धधक उठे। 1 मार्च 1857 ई0 को सुबह परेड मैदान में मंगल पांडे लाइन से निकल कर बाहर आ गये। अधर्मी अंग्रेजों को इन बातो के लिये दोषी ठहराते हुए गोलियां चलाने लगे। विद्रोह कर दिया। यही वह घड़ी थी जब से क्रांति का सूत्रपात हुआ और काम कर गई मातादीन की वह चिंगारी। घायल अवस्था मे मंगल पांडे गिरफ्तार किए गए। उनका कोर्ट मार्शल किया गया। 8 अप्रैल 1857 ई0 को पल्टनो के सम्मुख उन्हें फांसी पर लटकाया गया। मंगल पांडे का बलिदान सैनिको के लिए प्रेरणा बन गया। 10 मई1857 को बैरकपुर छवानी में क्रांति की लहर दौड़ गई और सम्पूर्ण क्रान्ति के लिए हिन्दू-मुसलमान सैनिकों ने विद्रोह कर दिया, जिसमे अनेक भारत माँ के सपूत शहीद हुए। और गिरफ्तार क्रांतिकारियों को कोर्ट मार्शल किया गया। मातादीन मातृभूमि की रक्षा करने के आरोप में शहीद हुए।
चेतराम जताव और बल्लू मेहतर
चेतराम जाटव और बल्लू मेहतर उन्हीं दलित देशभक्त सपूतो में से एक है जिन्होंने 1857 के विद्रोह में ब्रिटिश सत्ता से टक्कर ली और देश के सम्मान के लिए बलिदान हो गए। चारो तरफ क्रांति का बिगुल बज उठा,हजारो देशभक्त घरों से निकलकर क्रांति के कारवां में सम्मिलित हो गये। उन्ही देशभक्तो में चेतराम जाटव औऱ बल्लू मेहतर भी थे जिनका योगदान इस क्रांति में सदैव स्मरणीय रहेगा। 26 मई 1857 को सोरो क्षेत्र की क्रान्ति ज्वाला में चेतराम जाटव और बल्लू मेहतर अपने प्राणों की आहुति देने कूद पड़े। इस क्रांति में उनके साथ सदाशिव मेहरे रामनाथ तिवारी,चतुर्भुज वैश्य,सदासुखराम सक्सेना,विशम्भर कोठेदार, द्वारिका प्रसाद,तथा हाफिज रजब अली आदि भी थे। फिलिप्स की सेनाओं से इन देशभक्त सपूतो ने डटकर मुकाबला किया तथा इनकी शौर्यता,वीरता, बुद्धिमानी व साहस के सामने ब्रिटिश सेना को भागना पड़ा। परन्तु आगरा और मैनपुरी से अंग्रेजी सेना आ जाने से पासा पलट गया। दुर्भाग्यवश क्रांति विफल हो गई। सभी क्रांति वीरो को गिरफ्तार कर लिया गया। चेतराम जाटव व बल्लू मेहतर को पेड़ो से बांधकर गोलियो से उड़ा दिया गया। बाकी को कासगंज में पेड़ो पर लटकाकर फाँसी दी गई। चेतराम जातव व बल्लू मेहतर ने एटा जनपद सोरो क्षेत्र के अति निर्धन एवं अछूत परिवारो में जन्म लेकर अछूत वर्ग को गौरवान्वित किया। उनके पिता निर्धन अवश्य थे किन्तु देशभक्ति व आत्म-सम्मान में किसी चक्रवर्ती सम्राट से कम न थे। उन्ही संस्कारो में दोनों मित्रो का पालन-पोषण होने के कारण उन्होंने अपने प्राणों को देश पर न्यौछारवार कर दिया। उनकी शौर्यता, वीरता व साहस पर हर देशवासी को गर्व रहेगा।
बांके चमार
1857 की क्रांति में बागी नेता हरिपाल सिंह के साथी रहे अमर शहीद बांके चमार, ग्राम कुंवरपुर, तहसील मछली शहर,जानपद जौनपुर के निवासी थे। क्रांति विफल होने पर 18 लोग बागी घोषित किये गये। उनमे बांके चमार का नाम प्रमुख था, जिस पर ब्रिटिश सरकार ने 50 हजार का इनाम घोषित कर रखा था। गिरफ्तार होने पर बांके चमार को मृत्यु-दण्ड दिया गया। वह दलित वीर सेनानी अपनी मातृभूमि की रक्षा में हँसते -हँसते अपने प्राणों को न्यौछारवर कर फाँसी के फंदे पर झूल गया। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में इस महान देशभक्त बांके चमार का नाम सदैव अमर रहेगा।
वीरा पासी
1857 के इस महान संग्राम में वीरा पासी का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। रायबरेली जनपद के मुरारमऊ स्टेट के राजा बेनी माधव सिंह का अंगरक्षक वीरा पासी निवासी ग्राम डौंडिया खेड़ा मुरारमऊ, 1857 में राजा बेनी माधव सिंह को जेल से निकलकर लाया था। जबकि अंग्रेज अधिकारी पूर्णरूप से सतर्क थे। वीरा पासी के इस वीरतापूर्ण साहस तथा शौर्यता एवं बुद्धिमत्ता के कारण राजा बेनी माधव सिंह का जेल से निकल जाना एक चुनौती था। अंग्रेजों ने वीरा पासी को मुर्दा या जिन्दा पकड़ने की घोषणा कर दी और उस पर 50 हजार का इनाम घोषित कर दिया परन्तु वीरा पासी एक महान देशभक्त होने के साथ-साथ बहुत बहादुर एवं बुद्धिमान भी था। स्वतंत्रता संग्राम में राजा बेनी माधव सिंह के साथ उनका किया गया बलिदान एवं त्याग देश और दलित समाज के लिए प्रेरणा दायक है।
लोचन मल्लाह की चतुराई
27 जून 1857 ई0 में कानपुर में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह हो गया। अंग्रेज अपने परिवार को लेकर गंगा नदी से नाव द्वारा इलाहाबाद भागना चाहते थे। लोचन मल्लाह ने अलग नाव पर क्रांतिकारियों, जिनमे टीका सिंह,अजीमुल्ला,तांत्या टोपे थे,अंग्रेजों का पीछा किया। अंग्रेजों ने इनकी नाव पर गोली चलाई,आगे चलकर अंग्रेजो की नाव एक उथले जगह पर फँस गई। यह क्रांतिकारी सेनानी 80 अंग्रेज स्त्री-पुरुषों को अपने कब्जे में लेकर वापस कानपुर लाये। स्त्री,बच्चो को छोड़कर अंगेजो को गोलियो से भून दिया गया। लोचन मल्लाह की सूझ-बूझ से ही इस कार्य मे सफलता मिली।
अमर शहीद वीरांगना झलकारी बाई
1857 ई0 के स्वतंत्रता संग्राम में जहाँ हजारो दलित क्रंतिविरो ने संघर्ष किया वही अनेक दलित वीरांगनाओ ने भी अपने प्राणों की आहुति दी। उन्हीं वीरांगनाओ की सिरमौर थी अमर शहीद वीरांगना झलकारी बाई। जो एक अछूत वर्ग की उपजाति कोरी की थी। उनके पति पुरान कोरी राजा गंगाधर राव के राज दबार में मामूली सिपाही थे। झलकारी बाई कभी-कभी अपने पति के साथ राजमहल में जाती थी। इनका चेहरा और व्यक्तित्व रानी लक्ष्मीबाई के समान था जो 1857 के विद्रोह के समय मूल्यवान सिद्ध हुआ क्योंकि जिस समय रानी लक्ष्मीबाई को किले में अंग्रेजी सेना ने घेर लिया तब झलकारी बाई ने रानी को चालाकी से किले से निकलकर अपने को रानी लक्ष्मीबाई घोषित कर अंग्रेजों का युद में संहार करने प्रारम्भ कर दिया। उनका मुख्य उद्देश्य था अंग्रेजों को लड़ाई में पूरे दिन उलझाए रखना ताकि रानी लक्ष्मीबाई बिठूर के सुरक्षित स्थान तक पहुंच जाय। झलकारी बाई की यह योजना सफल रही। परन्तु अंग्रेज उन्हें रानी लक्ष्मीबाई समझकर पूरे दिन लड़ते रहे। युद्ध मे झलकारी बाई के प्रलय के तांडव से अंग्रेज सेना के पल भर में पैर उखड़ गए, झलकारी बाई अंग्रेजों के लिए मौत की आंधी बन चुकी थी तभी एक सनसनाती गोली उनके सीने को चीरते हुए आर-पार हो गई। उनका घोड़े से गिरना क्या था कि शरीर सैकड़ो गोलियो से छलनी हो गया। रानी लक्ष्मीबाई के प्रति सच्ची मित्रता, मातृभूमि की रक्षा और उसकी स्वतंत्रता के लिये अपने कर्तव्य का पालन करते हुए रांगना झलकारी बाई वीरगति प्राप्त कर अमर हो गई।
अमर वीरांगना महाबीरी देवी (भंगी)
अमर वीरांगना महाबीरी देवी ग्राम मुंडभर भेजू तहसील कैराना जिला मुजफ्फरनगर की रहने वाली थी। वह थी तो अशिक्षित फिर भी उनकी बुद्धि विलक्षण थी। शौर्यता तथा निर्भिकता उनकी विशेषता थी।बाल्यवस्था से ही साहसी तथा शक्तिशाली होने के कारण वह तेज स्वभाव की थी। वीरांगना महाबीरी देवी ने अपने समाज की नारियो का एक संगठन बनाया जिसका उद्देश्य था घृणित कार्यो में लगी महिलाओं व बच्चों को हटाना और सम्मान के लिये जीना और सम्मान के लिए मरना। अंग्रेजो ने जब मुजफ्फरनगर को अपने अधिकार में लेने के लिए आक्रमण किया तब इन स्वभिमानी नारियो ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने को समर्पित कर दिया। वीरांगना महाबीरी देवी ने 22 नारियो की एक टोली लेकर अंग्रेजों की सेना पर आक्रमण कर दिया अंग्रेजों को यह उम्मीद नहीं थी कि गांव की महिलाएं उन पर आक्रमण करेगी क्योकि उन्हें लड़ाई करके भला क्या मिलने वाला था? परन्तु महाबीरी देवी अपनी दलित स्त्रियों के साथ सशस्त्र होकर अंग्रेजी सेना से जा भिड़ी,घमासान युद्ध हुआ,अंग्रेज उनकी वीरता देखकर आश्चर्यचकित रह गये। कई अंग्रेज महाबीरी देवी के हाथों मारे गये। परन्तु अंग्रेजो की सेना बहुत विशाल थी अन्त में महाबीरी देवी तथा उनके साथ 22 अज्ञात दलित वीरांगनाएं भी मारी गई। देश को उनके त्याग और बलिदान पर हमेशा नाज रहेगा।
ऊदा देवी पासी
1857 के विद्रोह की चिंगारी जब लखनऊ पहुँची तो यहाँ की पासी जाति ने कौशल दिखाया। सन 1857 ई0 में नवाब वाजिद अली शाह के कलकत्ते के मठिया बुर्ज किले में कैद किये जाने पर उनकी बेगम हजरत महल ने अंग्रेजों से संघर्ष छेड़ दिया। इनकी सेना में पासियो की एक टुकड़ी थी तथा बेगम हजरत महल की स्त्री सेना में पासी जाति की ऊदा देवी सैनिक थी। अंग्रेजों ने जब लखनऊ पर हमला किया तो ऊदा देवी ने सिकन्दर बाग में पेड़ पर चढ़कर अपने को पत्तो में छिपकर वहाँ पानी पीने आने वाले 36 अंग्रेज सैनिको को मार डाला था। बाद में उसकी भी हत्या कर दी गई। उसके पति पक्का पासी पहले ही युद्ध मे मारे जा चुके थे। अन्त में अंग्रेजों की गोली से इस वीरांगना को वीरगति प्राप्त हुई,और इतिहास में सदा के लिए अमर हो गई।
पासी जाति के अन्य क्रांति वीर
पासी जाति के कुछ ओर क्रांतिवीर भी थे जिन्होंने इस क्रांति में अपनी मातृभूमि के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया और देश के लिए शहीद हो गये। दरअसल अंग्रेजों ने 1857 के विद्रोह में लखनऊ को अपना प्रमुख़ केन्द्र बनाया। रेजीडेंसी, बेलीगारद में अंग्रेज अधिकारी रहते थे। क्रांतिवीरों ने रेजीडेन्सी को चारों तरफ से घेर लिया। क्रांतिवीरों का नेतृत्व चेतराम रैदास कर रहे थे, जिनका बनाया हुआ टिकैत राय तालाब के निकट "चेतरामी तालाब" आज भी मौजूद है।
बेगम हजरत महल,मम्मू खां, जनरल बरकत अहमत ने एक योजना बनाई कि कानपुर से जब तक हैवलॉक की सेनाए लखनऊ आये उससे पहले रेजीडेन्सी पर आक्रमण करके अपने अधिकार में ले लिया जाय। किन्तु रेजीडेन्सी में प्रवेश कर पाना उतना ही कठिन था जितना गोमती की धारा को उल्टा बहाना। चारो ओर से रेजीडेन्सी पर तोपे लगी थी। अंग्रेज सैनिक मुस्तैदी से किसी भी आक्रमण को विफल करने के लिए तैयार थे। पासी जाति के लोग सुरंग उड़ाने में बड़े ही चतुर थे अक्सर बेलीगारद वालो को उनसे नुकसान पहुँचता रहता था।
10 अगस्त 1857 को जरनल बरकत अहमद के नेतृत्व में पासी जाति के लोगो को साथ लेकर फौज ने बेलीगारद पर आक्रमण कर दिया। तीन दिन तक घमासान युद्ध होता रहा-बेलीगारद की सुरंगे उड़ने लगी। रेजीडेन्सी में फँसे अंग्रेज भयभीत हो गये। लेकिन कानपुर से मि0 हैवलॉक की सेनाए लखनऊ सीमा पर आ पहुंची तथा दूसरी ओर फैजाबाद से चिनहट (लखनऊ के पास का स्थान) तक आ गयी। बंथरा में उनका मुकाबला स्वंय बेगम हजरत महल ने किया लेकिन जख्मी हो गयी और उनके वफादार सेनापति मानसिंह तथा विजयपाल सिंह उन्हें शहर ले आये।
सिकंदर बाग के पास घमासान लड़ाई हो रही थी। कम प्रतिष्ठित व्यक्तियो की स्त्रियां (अछूत) नगर की रक्षा के लिये अपने प्राणों को न्यौछावर कर रही थी,वे स्त्रियां जंगली बिल्लियों की तरह लड़ रही थी,और उनके मरने के पहले यह पता नही चलता था कि स्त्रियां है या पुरुष। सिकंदर बग में सेमर के वृक्ष के नीचे जिसने अनेक अंग्रेजो को मार गिराया वह महिला उजरियांव की पासी जाति की “जगरानी” थी। अन्त में यह महिला भी गोली से घायल होकर वीरगति को प्राप्त हुई।
निष्कर्ष
दुर्भाग्यवश बेलीगारद की क्रांति विफल हो गयी और उसमें 220 देशभक्त शहीद हुए तथा 150 घायल हुए जिसमे अधिकांश पासी जाति के अज्ञात अमर शहीद थे। ऐसे ही अनेक अछूत वीर योद्धा और भी थे जिन्होने 1857 की क्रांति में मातृभूमि की रक्षा के लिये अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया और शहीद हो गये। लेकिन मैंने अपने लेख में प्रमुख़ अछूत वीर योद्धाओं को ही सम्मलित किया है। इतिहासकरो ने उनके नमो को दबाया और उजागर नही होने दिया। मातृभूमि के प्रति जितना स्नेह अछूत वर्ग को था शायद ही अन्य किसी वर्ग को हो। क्योंकि वही धरती पुत्र है, जो मांटी का श्रृंगार करना जनता हो,और बिखेर देता है अपनी श्रमशक्ति,खून-पसीने से हरियाली ही हरियाली। सच्चा देश प्रेम, मातृभूमि के प्रति उत्सर्ग हो जाने की भावना अछूत वर्ग में कूट-कूट कर भरी है। इसिलिए इस वर्ग ने 1857 ई0 के स्वतंत्रता संग्राम के लिये अपने प्राणों को न्यौछावर करने में ही अपना गौरव और कर्तव्य समझा। यदि भरतीय इतिहास से दलितो के योगदान को निकाल दिया जाय तो इतिहास की कल्पना करना ही व्यर्थ होगा।
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