अनुसूचित जातियो मे प्रमुख है, भारत का मूल “ चमार वंश"
डॉ. ओम प्रकाश सिंह
मौर्य सम्राट अशोक महान के बाद गुप्तकाल में
बौद्ध धर्म का पतन होने लगा। आगे चलकर राजपूतों और तुर्को ने तो बौद्धों का सफाया
ही कर दिया। ऊंच-नीच का भेद-भाव बढने से समाज में एक नया अछूत वर्ग पैदा हो गया।
डॉ. अंबेडकर के मतानुसार अछूतों के पूर्वज बौद्ध थे और शरणार्थी बनकर गाँव के बाहर
बसे थे। वे उस समय अछूत नहीं थे। छिन्न-भिन्न हुए पशुवत मरे आदमी के समान थे, न कुछ कम न कुछ अधिक। वैदिक काल
में धर्म के नाम पर यज्ञों में पशुओ की बलि दी जाती थी तथा लोग गोमांस खाते थे।
ब्राह्मणो ने बाद मे गोपूजा करनी प्रारम्भ कर दी तथा पशुबलि को बंद कर दिया। अब
लोगो ने गौमांस खाना छोंड़ दिया परंतु यें ग्राम से बाहर अलग-अलग हुए लोग; मरे हुए पशु का मांस खाते रहे क्योंकि महात्मा बुद्ध ने हिंसा द्वारा पशु
मारकर खाने की निंदा की थी। तथा मारे हुए पशु का मांस खाने का समर्थन। मरे हुए
जानवरों पर इन छितरे हुए लोगो का अधिकार हो गया; जो बौद्ध
थे। अब वे ही ब्राह्मण जो पहले मांस खाते थे, इनको अपवित्र
मनाने लगे और अछूत कहने लगे। कालांतर में इन्होने (चमारो) पशुओ की खाल उतरना, उसे रंगना, उपयोगी बनाना, उससे
रस्सियाँ, जूते एवं अन्य उपयोगी वस्तुए बनाना शुरू कर दिया। सवर्ण
जतियों ने इन्हे दास बना लिया और इनसे हर तरह की बेगारी का काम लेने लगे। इन मजदूर
कुशलकर्मी, मेहनती लोगों ने देश का उत्पादान बढ़ाकर भारत की
सभ्यता एवं संस्क्रति के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन्हे अछूत या चमार
कहा जाने लगा तथा इन पर अनेक प्रतिबंध लगाकर पशु से बदतर बना दिया।
‘चमार’
शब्द च+म+अ+र के योग से बना हैं, अर्थात चर्म+मज्जा +अस्थि
+रूधिर का योग अर्थात चमार का जन्म आदि पुरूष के सम्पूर्ण शरीर से हुआ हैं।तथा
उनमें सभी वर्णो के गुण हैं। महान विद्वान शैयरिंग का कथन है कि चमार जाति में आधा
हिस्सा ब्राह्मण, एक चौथाई वैश्य, और
एक चौथाई शूद्र का है। माननीय शैयरिंग का यह कथन मुझे भी सही लगता है क्योंकि चमार
जाति के लोगों को यदि समुचित वातावरण मिले तो उनकी बुद्धि ब्राह्मण वर्ग से किसी
भी स्थिति में कम नहीं होती हैं। कालांतर में चमार अनेक उपजातियों मे बंट गये-
जैसवार, रैदास, दुसाध, पासी, रामदासी, कोरी, महार, रविदास, जाटव, धूसिया, अहरवार, दोहरे, संखवार, कुरील, खटीक, डोर, मांड, धनुक, आदि विद्वान मिस्टर ब्रिग्स की अंग्रेजी पुस्तक ‘दी
चमार’ में चमार जाति की उपजातियों की संख्या 1156 बताई गयी
हैं।
बहिष्कृत शूद्रों को अपमान पग-पग पर झेलना
पड़ता तथा वह अपमान चमार जाति के लोगों को ही उठाना पड़ता हैं। वर्तमान में भी देखा
जाय तो उनके साथ अपमान का व्यवहार हो रहा हैं। लेकिन आधुनिक समय में इनमें जागृति आई
है। चमार जाति के नाम पर अपमानित होने के कारण वे अपने को चमार न कहकर दूसरी
जातियों के उपनामों का प्रयोग करने लगे हैं।
श्री करन सिंह दीवान ‘चामर जाटव सम्राट’ नामक पुस्तक में कहते हैं कि
सदियों से भारत में चमारों (जाटवों) का शोषण होता रहा हैं। इन्ही अत्याचारों के
कारण चमार जाति समय-समय पर बचाव हेतु जाति व धर्म बदलती रही है। चमार ब्राह्मण बने, राजपूत बने, वैश्य बने,
क्षत्रिय बने, मुसलमान बने, ईसाई बने, सिक्ख बने, बौद्ध बने, आदि
धर्मी बने, अधर्मी बने, नास्तिक बने, ईश्वरवादी बने, राधास्वामी बने, वैरागी बने, आचार्य बने, भक्त
बने, नवीन शर्मा बने, सूर्यवंशी बने, अतः चमार जाति संसार में पायी जाने वाली बड़ी से बड़ी एवं छोटी से छोटी हर
जाति के गुणों से सम्पन्न रही। चमारो ने हजारों रूप बदले परंतु भारतीय आर्यों ने
इन्हे ‘चमार’ ही कहा और उनसे बैर, नफरत का ही बर्ताव किया। इस चमार नाम के पुछल्ले से बचने के लिए इन्होने
अनेक प्रयास किये पर यह पुछल्ला लगा ही रहा।
जातिवाद ऊँच-नीच की भावना से भयभीत होकर चमार
छिपकर दूसरी जातियों में मिलता रहा है। अगर देखा जाय तो भारत का 85% ईसाई, चमार बना है, 25% मुसलमान, चमार बना है, 10% ठाकुर, 25%
जाट, 10% भारत की अन्य हिन्दू कही जाने वाली जातियों मे चमार
मिला है। 90% सिक्ख धर्म में आज भी चमार है इतना ही नहीं पूरे सिक्ख धर्म में आज चमार ही सरगना है और अधिकांश
गुरूद्धवारों में पुजारी चमार ही है।
चमार जाति के लोग चमार शब्द को अपने से दूर
हटाने के प्रयास में लगे है। बौद्ध धर्म ग्रहण करने का ज़ोर शिक्षितों में बढ़ रहा
है, बौद्ध धर्म ग्रहण कर लेने पर वे अपने संबन्धियों से दूर हट
जाते है। कभी-कभी वे उनसे कहते है कि तुम लोग चमार हो, मैं
तो चमार नहीं बौद्ध हूँ। इन नव दीक्षित बौद्धों को अन्य जाति के लोग उसी तरह चमार
ही जानते है जैसे वे जैसवार या राजपूत जाटव कहे जाने वाले लोगों को, और ये लोग अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिये अपनी पुरानी जाति के स्थान
पर नई जातियाँ कहलाना पसंद करते है। खटीक सोनकर कहलाना पसंद करते है, तो पासी राजवंशी और सफाई मजदूर वाल्मिकी कहलाने में गर्व का अनुभव कहते
है।
चमारों कि जनसंख्या गोरखपुर, आजमगढ़, मेरठ, बिजनौर, जौनपुर, बुलंदशहर, आगरा, कानपुर, वाराणसी, सहारनपुर, देवरिया, अलीगढ़, आदि जिलों में अधिक हैं। लेकिन जौनपुर के चमार अपने
को जैसवार या जैसवारा भी कहते हैं। इलाहाबाद, वाराणसी, फैजाबाद, तथा मिर्जापुर जिले के चमार भी अपने को
जैसवार कहते हैं। कहीं-कहीं रैदास भी कहते हैं।
‘हरिजनवाद’ पुस्तक में श्री बलवंत सिंह ने जाटव जाति के बनने के संबंध में लिखा है
आगरा निवासी श्री रामबाबू का कहना है कि
हजारों वर्षों से गुलामी के कारण ‘चमार’ शब्द बहुत ही नीच माना जाने लगा था जिसके कारण 1935-1936 के स्वतंत्रता
आंदोलन के समय चमारों के कुछ सुधारवादी नेताओं ने चमार नाम से पिण्ड छुड़ाने के
लिये एक दूसरा नाम ‘यादव’ गढ़ा बाद में
ये ही ‘जाटव’ कहे जाने लगे और बहुत से
चमारों ने यह परिवर्तन मान लिया। इस आंदोलन के प्रमुख नेता डॉ मानिक चंद सेठ,
गोपीचन्द सेठ, बनवारीलाल, सेठ रामनारायण दास, यादवेन्द्र सेठ, केशवचंद्र, रामस्वरूप, तथा
चंद्रभान आदि थे। अगरे की जीवन मण्डी के इन चमार नेताओं ने इस आंदोलन को दूर-दूर
तक फैलाया, जाटव आंदोलन उत्तर प्रदेश के पश्चिमी जिलों-
दिल्ली, हरियाणा, और राजस्थान में विशेष
रूप से फैला। अपने नाम के आगे ये लोग सिंह लगाते है। और अपने को चमारो से श्रेष्ठ
जताने का प्रयास करते है। किन्तु इन क्षेत्रों के सवर्ण लोग इनके साथ चमार जाति की
ही तरह व्यवहार करते हैं।
अनुसूचित जातियों में ‘चमार’ एक प्रमुख जाति हैं। इसीलिए चमार जाति को दूसरी अनुसूचित जातियों के साथ सदभाव
का व्यवहार करना चाहिए। इसके साथ ही साथ खान-पान और रोटी-बेटी का सम्बंध बनाने पर
भी विचार करना चाहिए। मेरे विचार से तो तभी सही रूप से सामाजिक न्याय होगा और इसी
प्रकार सभी अनुसूचित जातियाँ एकजुट हो सकेगी।
चमार जाति अपनी श्रेष्ठता में किसी दूसरी
जाति से कमतर नहीं हैं। क्योंकि इसमें भी
प्राचीन काल से ही बड़े-बड़े शासक, संत महात्मा हुए हैं। 12
वीं सदी के उत्तरार्द्ध में उत्तरी भारत
पर दलित राजा ‘सातन पासी’ के पूर्वज
शासन करते थे। महाराजा सातन पासी के 12 किले थे, जिनमें सातन
कोट,सोहनिया सादेर, नाहेर, काकोरगढ़, बिजनौर प्रमुख थे। वह एक सफल शासक व कुशल
योद्धा था। उसने मोहम्मद गोरी की सेना को हराने तथा विद्रोह को दबाने के लिये अपने
प्राणो की आहुती दे दी थी। संत शिरोमणी गुरु रविदास तथा कबीर साहेब
आदि संतों ने अंधविश्वास व पाखण्ड का खण्डन करके भक्ति आंदोलन से भारतीय समाज का
उद्धार किया। 18 वीं सदी में गुरु घासी दास ने दलितो के उत्थान के लिये ‘सतनामी पन्त’ की स्थापना की। उन्होने सत्य, अहिंसा तथा “सभी मानव एक हैं ” की शिक्षा दी। उन्होने समता तथा सत्य का
प्रचार किया और जातिवाद, छुआछूत तथा पत्थर पूजा का विरोध
किया।
चमारों ने स्वतंत्रता आंदोलन में भी बढ़-चढ़ कर
भाग लिया। प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन की वीर सिपाही वीरांगना झलकारी बाई ने अपनी रियासत
झाँसी की अंग्रेज़ो से रक्षा करने के लिये महारानी लक्ष्मीबाई की जगह रानी जैसी
वेषभूषा पहनकर अंग्रेजों के विरूद्ध खूब लड़ी तथा अपने प्राणो की आहुती दे दी। जबकि
उनके पति पूरन और भाऊ बख्शी आदि दूसरे स्थानो पर अंग्रेजों से लोहा ले रहे थे।
उदइया चमार को भला कौन भुला सकता हैं जिसने 1857, अलीगढ़
की क्रांति से 50 वर्ष पूर्व गनौरी के खाली किले में बारूद की सुरंगे बिछा दी थी, जिसमें सैकड़ों अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था। बाद में इस महान
क्रांतिवीर को फांसी पर चढ़ाया गया। वीरवर उदइया चमार की गौरव गाथा आज भी क्षेत्र
के लोगो में प्रचलित हैं।
भारत को आज़ाद कराने में इस समाज के लोग आज़ादी
की लड़ाई में भी कूद पड़ें और इस समाज ने देश को आजाद कराने में भी अपना महत्वपूर्ण
योगदान दिया। चाहे वह जालियावाला हत्या काण्ड हो या चौरी-चौरा काण्ड, असहयोग आंदोलन रहा हो या सविनय अविज्ञ आंदोलन, व्यक्तिगत
सत्याग्रह हो या भारत छोड़ो आंदोलन, आजाद हिन्द फौज हो या
संविधान निर्माण। सभी में चमार समाज के लोगो ने बढ़-चढ़ कर अगवानी की, जिससे चमारो की शौर्यता, वीरता और साहस पर हर एक
भारतवासी को गर्व रहेगा।
देश को आजाद कराने वाले चमार जाति के क्रातिवीरों और शहीदो के नाम
चौरी-चौरा काण्ड : अमर शहीद रामपती चमार, अमर शहीद संपति
चमार, अमर शहीद छोट्टू पासी, क्रांतिवीर
अयोध्या चमार, क्रांतिवीर अगलू पासी,
क्रांतिवीर कल्लू चमार, क्रांतिवीर गरीब चमार, क्रांतिवीर नोहर चमार, क्रांतिवीर फलई चमार, क्रांतिवीर बिरजा चमार, क्रांतिवीर मंडी चमार, क्रांतिवीर मेढई चमार (गोरखपुर)।
असहयोग आंदोलन: मिठई चमार, मुक्खू
चमार, ठेलू चमार (गोरखपुर), दुर्जन
चमार, चौधरी परगी लाल (सीतापुर),
रामप्रसाद चमार (आजमगढ़), सूरज नरायन चमार (सुल्तानपुर), सीताराम चमार, जोधा चमार (लखनऊ)।
नमक सत्याग्रह और सविनय अविज्ञ आंदोलन: अमर
शहीद बलदेव प्रसाद कुरील (कानपुर), सूचित राम
जयसवार (चमार), छोट्टे लाल पासी, टीकराम पासी, चंद्रिका प्रासाद पासी (लखनऊ), क्रांतिवीर विंदेश्वरी, रघुवर चमार, रामदुलारे चमार, उमराव चमार,
भभूति चमार (गोरखपुर), चौधरी परगी लाल (सीतापुर), कंधाई पासी (सुल्तानपुर), पूरनमासी चमार, चिल्लू चमार (देवरिया), पूरनमल जाटव, भजनलाल, (आगरा), झब्बल रैदास
(खीरी), अयोध्या चमार, कमले चमार, घुम्मन चमार, बनवारी चमार, धनपत
चमार, हरदयाल चमार (इटावा), रामलाल
चमार (कानपुर), घासी चमार, रामलाल चमार, दरसन चमार (फ़र्रुखाबाद)।
व्यक्तिगत सत्याग्रह : नारायण दास चमार, मोहन लाल, मैकूलाल, टीकराम, उमराव, जगन्नाथ प्रसाद, कंधई
(लखनऊ), अयोध्या चमार (इटावा), अयोध्या
चमार, गुनई चमार, (फैजाबाद), विभूति चमार (गोरखपुर), छेदीलाल रैदास, नंगराम रैदास (खीरी), बलदेव सिंह आर्य (गढ़वाल), रामाधार चमार (बलिया), राजाराम छिपी, मंशाराम (सहारनपुर), बिहारी
चमार (उन्नाव), खूशीराम(बिजनौर)।
भारत छोड़ो आंदोलन: मैकुलाल चमार (सीतापुर), शिवधान चमार (आजमगढ़), झाऊलाल जाटव (मुरादाबाद), नानकऊ मेहतर(इललाहाबाद), रामसुभग चमार, हरी चमार, घेला दुसाध (बलिया), बसंत लाल, मानसिंह आजाद (लखनऊ), कल्लू चमार (जौनपुर), समंता राव जाटव (आगरा), छिबनू चमार, सुमेरराम चमार, सुखदेव चमार (वाराणसी), सत्यनारायन चमरु (गाजीपुर) कंधई लाल धूसिया, मुन्ना रविदास, रामदीन रविदास, कल्लू रविदास (कानपुर), धज्जू चमार, रामखिलख चमार (फैजाबाद) महावीर हरिजन (गोरखपुर), पूरन लाल रैदास, प्यारेलाल रैदास, (खीरी), कमला हरिजन, गाजिराम चमार, (लखनऊ), जवाहिर चमार (हरदोई), हरी सिंह जाटव (मेरठ), मंगल लाल चर्मकार (झाँसी)।
आजाद हिन्द फौज: रामप्रसाद
चमार (कानपुर), भोलाराम जैसवार (वाराणसी), कांशीराम, गबड़ राम, कन्या राम
(हरियाणा), बाबूलाल
(लखनऊ)।
इतना ही नहीं जब शैडयूल्ड कास्ट फेडेरेशन ने
सन 1946-1947 में देशव्यापी आंदोलन छेड़ा, तो आंदोलन का
उद्देश्य था, अछूतों के अधिकारों की रक्षा, और उनका नारा था “अधिकारों के लिये लड़ना होगा, जीना
है तो मारना होगा”। देश भर की जेलो में लगभग 25 हजार सत्याग्रही भर गये। उन्ही
क्रांतिवीरों में थे अमर शहीद दोजीराम जाटव जो 12 जून सन 1947 लखनऊ जेल की सलाखों
के पीछे अपने देश-जाती के लिये शहीद हो गये। जो ग्राम चांदपा, तहसील हाथरस, जिला अलीगढ़ के रहने वाले थे। बाबू
जगजीवन राम, जुगल किशोर, डॉ॰ अंबेडकर, स्वामी अछूतनंद, प्रथ्वी सिंह आजाद तथा भिखू सिंह
आदि ने देश को आजाद कराने के साथ ही साथ अपने समाज को आगे ले जाने में भी अपना
महत्वपूर्ण योगदान दिया। अनेक चमार युवको ने सुभाषचंद्र बोस की “आजाद हिन्द फौज”
में शामिल होकर आजादी की लड़ाई लड़ी। और अपने समाज का नाम रोशन किया।
आज ‘चमार’ समाज में आने वाले व्यक्तियों की संख्या लगभग 20 करोड़ है। यह एक श्रेष्ठ
जाती है। इसके गोत्र अनेक क्षत्रिय जातिओं में पाये जाते हैं। इसमें संत रविदास
तथा कबीर हुए। डॉ॰ अंबेडकर (महार) का तो विकल्प किसी जाती में भी नहीं है, वे भी चमारों की एक उपजाति में से हैं। दादा साहब गायकवाड, बेरिस्टर खोवारगढ़े, प्रो॰ बी॰पी॰ मौर्या, बाबू जगजीवन राम, चौ॰ चांदराम, रामविलास पासवान, कांशीराम,
बहन कुमारी मायावती एवं मीरा कुमार आदि महापरूषों का जन्म इसी चमार जाती में होने
से इस जाती का महत्व बहुत बढ़ गया हैं। आज उत्तर प्रदेश ही नहीं भारत की राजनीति
इसी जाति के इर्द-गिर्द घूमती नजर आती है, पहले बाबा साहब
डॉ॰ भीम राव अंबेडकर की जयंती उसी जाति के लोगों द्वारा मनाई जाती थी, लेकिन आज वोट बैंक की राजनीति में सवर्ण लोग भी चमारों को सहयोग प्रदान
कर रहे हैं। इतना ही नहीं आज भारत की सभी
राजनीतिक पार्टियों ने बाबा साहेब को ही अपना सिम्बल बना रखा हैं। इस वर्ष तो बाबा
साहब डॉ॰ भीम राव अंबेडकर की 125 वीं जयंती (२०१६) को सम्पूर्ण विश्व में मनाया गया
तथा बाबा साहब को ‘विश्व रत्न’ देने की
कवायत शुरू हो गई है। आज संसार का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं हैं; जिसमें चमार जाति अपना महत्वपूर्ण योगदान न दे रही हो, चाहे वह राजनीति का क्षेत्र हो या सामाजिक, साहित्य
का क्षेत्र हो या मनोरंजन का, खेल का क्षेत्र हो या सिनेमा
का, रक्षा का क्षेत्र हो या विज्ञान प्रोधौगिकी का, आदि सभी क्षेत्रों मे चमार जाति के लोग बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। मेरे
विचार से यदि इस जाती का एक मजबूत संगठन हो जाय तो यह बहुत सशक्त हो सकती है।
लेकिन आज तो यह है कि इस जाती के लोग
सम्पन्न होकर अपनी जड़ों से ही अलग हो जाते है और सवर्ण लोगों के समुदाय में
सम्मिलित हो जाते है। इसमे उनकी अपनी निजी उन्नति सार्वजनिक समाज की उन्नति में
बाधा बन जाती है। गरीब दल, गरीब असाहय ही रह जाता है। सम्पन्न
लोगों को चाहिए कि वे अपने गरीब और असाहय भाइयों का ख्याल रखे तथा उन्हे ऊपर उठाने
में सहयोग करे, क्योंकि ये ही लोग उनकी शक्ति है और मेरे सभी
शिक्षित भाईयों को भी अंबेडकरवादी मिशन को सहयोग देना चाहिए,
जिससे सामाजिक परिवर्तन लाया जा सकता है।
मैं अपने समाज के शिक्षित एवं सुसंपन्न भाइयों से अपने लेख के माध्यम से सानुरोध निवेदन करता हूँ कि हमें अपने समाज को यदि जागरूक बनाना है तो हमारे आचार-विचार तथा व्यवहार शुद्ध होने चाहिए। हमारे अंदर उच्च विचार, अच्छे संस्कार, शिक्षा एवं संगठन की भावना होनी चाहिए। अपने मसीहा तथा नेताओं के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए, तभी हमारा मिशन और हमारा समाज मजबूत हो सकता है।
संदर्भ:
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Names of the martyrs and martyrs of Chamar caste who liberated the country:-
Chauri-Chaura case: Amar Shaheed Rampati Chamar, Amar Shaheed Sampati Chamar, Amar Shaheed Chhotu Pasi, Krantiveer Ayodhya Chamar, Krantiveer Aglu Pasi, Krantiveer Kallu Chamar, Krantiveer Garib Chamar, Krantiveer Nohar Chamar, Krantiveer Phalai Chamar, Krantiveer Birja Chamar, Krantiveer Mandi Chamar, Krantiveer Medhai Chamar (Gorakhpur).
Non-Cooperation Movement: Mithai Chamar, Mukkhu Chamar, Thelu Chamar (Gorakhpur), Durjan Chamar, Chaudhary Pargi Lal (Sitapur), Ramprasad Chamar (Azamgarh), Suraj Narayan Chamar (Sultanpur), Sitaram Chamar, Jodha Chamar (Lucknow).
Salt Satyagraha and Civil Disobedience Movement: Amar Shaheed Baldev Prasad Kuril (Kanpur), Inform Ram Jaiswar (Chamar), Chhote Lal Pasi, Tikaram Pasi, Chandrika Prasad Pasi (Lucknow), Krantiveer Vindeshwari, Raghuvar Chamar, Ramdulare Chamar, Umrao Chamar, Bhabhuti Chamar (Gorakhpur), Chaudhary Pargi Lal (Sitapur), Kandhai Pasi (Sultanpur), Pooranmasi Chamar, Chillu Chamar (Deoria), Pooranmal Jatav, Bhajanlal, (Agra), Jhabbal Raidas (Kheeri), Ayodhya Chamar, Kamle Chamar, Ghumman Chamar , Banwari Chamar, Dhanpat Chamar, Hardayal Chamar (Etawah), Ramlal Chamar (Kanpur), Ghasi Chamar, Ramlal Chamar, Darsan Chamar (Farrukhabad).
Individual Satyagraha: Narayan Das Chamar, Mohan Lal, Maikulal, Tikaram, Umrao, Jagannath Prasad, Kandhai (Lucknow), Ayodhya Chamar (Etawa), Ayodhya Chamar, Gunai Chamar, (Faizabad), Vibhuti Chamar (Gorakhpur), Chhedilal Raidas, Nangram Raidas (Kheri), Baldev Singh Arya (Garhwal), Ramadhar Chamar (Ballia), Rajaram Chuppi, Mansharam (Saharanpur), Bihari Chamar (Unnao), Khushiram (Bijnor).
Quit India Movement: Maikulal Chamar (Sitapur), Shivdhan Chamar (Azamgarh), Jhaulal Jatav (Moradabad), Nankau Mehtar (Allahabad), Ramsubhag Chamar, Hari Chamar, Ghela Dusadh (Ballia), Basant Lal, Mansingh Azad (Lucknow), Kallu Chamar (Jaunpur), Samanta Rao Jatav (Agra), Chhibnu Chamar, Sumerram Chamar, Sukhdev Chamar (Varanasi), Satyanarayan Chamaru (Ghazipur), Kandhai Lal Dhusia, Munna Ravidas, Ramdin Ravidas, Kallu Ravidas (Kanpur), Dhaju Chamar, Ramkhilkh Chamar (Faizabad) Mahavir Harijan (Gorakhpur), Puran Lal Raidas, Pyarelal Raidas, (Kheeri), Kamla Harijan, Gaziram Chamar, (Lucknow), Jawahir Chamar (Hardoi), Hari Singh Jatav (Meerut), Mangal Lal Charmkar (Jhansi). Azad Hind Fauj: Ramprasad Chamar (Kanpur), Bholaram Jaiswar (Varanasi), Kanshi Ram, Gabad Ram, Kanya Ram (Haryana), Babulal (Lucknow).
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Hindi Books:
1. Dr. Sumanakshar Sohanpal, Tribal Chamar (History, Religion and Culture), Indian Dalit Sahitya Akademi, Delhi, 2002.
2. Narayan Badri, Vishnu Mohapatra, Anant Ram Mishra, Self-history of marginalized communities, Vani Prakashan, New Delhi, 2006.
3. Saroj Ram Parkash, Pasi Samaj Darpan, Samyak Prakashan, New Delhi, 2011.
4. 'Raj' Singh Rajpal, Swami Achhutanand Harihar Personality and Creativity, Dalit Literature Research Foundation, Delhi, 2009.
5. Rebel MR, Dalit Documents, Samyak Prakashan, Delhi, 2004.
6. Dusadh HL, Social Change and BSP, Samyak Prakashan, Delhi, 2005.
7. Dr. Prasad Mata, Role of Dalit Literature in Social Change, Indian Dalit Sahitya Akademi, Delhi, 2004.
8. Dr. Bhushan Mukesh, History of Dalits, Past and Present in the Mirror, Radha Publications, New Delhi, 2010.
9. Naimishrai Mohandas, Dalit revolutionary of freedom struggle.
10. Dr. Prasad Mata, Dalit Awakening in India and Its Forerunners (States in Different Statements), Samyak Prakashan, Delhi, 2010.
11. Dinkar DC, Contribution of Untouchables in the Freedom Struggle, Gautam Book Centre, Delhi, 2007.
English Books:
12. Aharwar, Gauri Shankar. Chamar Jati ki Utpatti avam Usaki Pragati (The origins of the Chamar Caste and Its progress) Chandra Kant Publisher, Kanpur, 1990.
13. Ahir, D.C. (ed.). “Dr. Ambedkar on the British Raj”, Blumoon, New Delhi, 1997.
14. Akela, A.R. Kanshi Ram Ke Saakshatkaar, Manak Publications (Pvt.) Limited, Delhi, 2007.
15. Ambedkar, B.R, Who were the Shudras and how they come to be the fourth Varna in Indo- Aryan Society, Thacker and Co, Bombay, 1946.
16. Ambedkar, B.R, Writtings and Speeches of Dr. Ambedkar,Department of Education, Government of Maharashtra, Bombay, 1989.
17. Briggs, George Weston. The Chamars. D.K. Publishers, New Delhi: 1997 (first published in 1920).
18. Gooptu, Nandini, Caste and Labour : untouchable social movements in Urban UP in the early Twenteeth century, Oxford University Press (First Published in 1993), Delhi,1996.
19. Gupta, S.K. “The Scheduled Castes in Modern Indian Politics: Their Emergence as a Political Power”, Munshiram Manoharlal, New Delhi, 1985.
20. Jatav, Mangal Singh. Shri 108 Swami Achhutanand ji ka jivan Parichaya (An Introduction to the life of Shri 108 Swami Achhutanand) Saraswati Press, Gwalior, 1997.
21. Jigyasu Chandrika Prasad, Shri 108 Swami Achhutanandji Harihar, Bahujan Kalyan Prakashan, Lucknow,1960.
22. Jigyasu Chandrika Prasad. Bhartiya Republican Party hi Kyon Avashayak Hai, Bhahujan Kalyan Prakashan, Lucknow, 1965;7th ed.,1984
23. Kshirsagar, R.K. Dalit movement and its leaders 1857-1956, M.D. Publishers, New Delhi: 1994.
24. Mahesh Shiromani, Hamare Harijan Neta, Konark Prakashan, Delhi, 1981.
25. Mukerji, A.B. The Chamars of U.P A Study in Social Geography, Inter India Publishers, New Delhi, 1980.
26. Narayan, Badri. Women Heroes and Dalit Assertion in North India: Culture, Identity and Politics, Sage Publication, New Delhi, 2006.
27. Pai, Sudha. From Harijans to Dalits: identity Formation, Political Consciousness and Electoral Mobilisation of Scheduled Castes in Uttar Pradesh, in Ghanshyam Shah (ed ) Dalit Identity and Politics, Cultural Subordination and the Dalit Challenge,vol.2. Sage Publications, New Delhi, 2001.
28. Pai, Sudha. Agrarian Revolution in Uttar Pradesh: A Study of the Eastern Districts, Inter India Publications, New Delhi, 1986.
29. Raghuvanshi,U.B.S. Shree Chanvar Purana( A Puranic History of Chamar) Commercial Press, n.d [The British Library’s acquisition date is August 1917], Kanpur.
30. Rawat, Ramnarayan S. Partition Politics and Achhut Identity: A Study of Scheduled Castes Federation and Dalit Politics in UP, 1946-48. In Suvir Kaul (ed.) The Partitions of Memory: the afterlife of the division of India. Permanent Black, Delhi: 2001.
31. Shah, Ghanshyam, Politics of the Scheduled Castes and Scheduled Tribes,Vora & Co. Publishers, Bombay, 1975.
32. Rawat, Ramnarayan S. Reconsidering Untouchability Chamars and Dalit History in North India, Permanent Black, Ranikhet Cantt, 2012.
33. Kumar Vivek, Dalit Leadership in India, Kalpaz Publications, Delhi, 2002.
34. Narayan, Badri, The Making of the Dalit Public in North India, Oxford University press, 2011.
