Note÷ English and Hindi Language.
EMERGENCE OF SHILPKAR MOVEMENT IN UTTRAKHAND (1900-1950).
Dr Om prakash Singh
उत्तराखंड में शिल्पकार आंदोलन का उदय (1900-1950)।
सार-- भारत में जाति व्यवस्था औपनिवेशिक नीतियों के परिणास्वरूप पहले की अपेक्षा बदल गई थी। ब्रिटिश सरकार की शुरुआती जनगणना ने सबसे अधिक प्रत्यक्ष प्रभाव जाति व्यवस्था पर ही डाला था। क्योंकि पहली बार जातियों की गणना ठीक प्रकार से हुई थी।इस जनगणना के परिणाम यह हुआ कि जातियों ने तुरंत ही न केवल अपनी-अपनी जातियों को संगठित किया बल्कि अपनी-अपनी जातियों का संगठन भी बनाना प्रारंभ कर दिया और इन्हीं संगठनों के माध्यम से दलित आंदोलन को जन्म दिया,जिससे उनकी स्थिति उस तरह से दर्ज की जा सके, जिस तरह से वे उन्हें सम्मान जनक समझे।निचली जातियों के संगठन बनने की यह प्रक्रिया उत्तराखंड ही नही बल्कि सम्पूर्ण भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रारंभ हो गई। उत्तराखंड में शिल्पकार महासभा के उदय भी इन्हीं परिस्थितियों का एक परिणाम था।शिल्पकार महासभा ने राज्य से शैक्षणिक संस्थानों और सिविल सेवा में आरक्षण जैसे नये लाभो का दावा किया।शिल्पकार सभा ने शिल्पकारों के बच्चों के लिए स्कूल और छात्रावासों की स्थापना की, और एक तरह से दलित आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया।अनेक विद्वानों का मत है कि शिल्पकार सभा ने अपनी जाति के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक उद्देश्यो के उत्थान के लिये भी कार्य किया।
भारत में दासता का जन्म कब और कैसे हुआ, इसका आधार केवल अनुमान ही है।ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर यह कहा जाता है की प्रारंभिक कबिलाई समाज मे न तो ददत थी और न ही शोषण की प्रक्रिया।इस कबिलाई समाज के परस्पर विरोधी वर्गो वाले समाज मे रूपांतरण के बाद दस-तथा अन्य शोषक-उत्पीडक प्रथाओं-अर्धदासता तथा जबरन व अनुबंधित श्रम आदि का जन्म और विकास हुआ। किसी भी समाज मे इस प्रकार की कुप्रथाओं का स्वरूप भिन्न हो सकता है, पर इनमें से कोई एक श्रेणी से अपेक्षाकृत बेहतर नही कही जा सकती है।आर्य शासित प्रदेशों में ऋग्वैदिक काल से ही शिल्पकार ग्रामीण उत्पादन का मुख्य अंग रहा है।पाणिनी एवं उनकी टीका " काशिका" से पता चलता है कि गाँव मे कुछ शिल्पकार यथा बढ़ई, राज,नाई, चमार, धोबी आदि होते थे, जो स्थाई रूप से नियुक्त होते थे और वर्ष में उन्हें अनाज का कुछ अंश मिलता था।
1815 ई0 में कुमाँऊ-गढ़वाल में ब्रिटिश राज्य की स्थापना हुई।यधपि प्रथम कमिश्नर गार्डनर ने 2 जून 1815 ई0 को दासों के व्यापार को बन्द करने की घोषणा की। लेकिन यह प्रथा 1833 ई0 ब्रिटिश साम्राज्य से दासता हटाये जाने के पश्चात भी मध्य हिमालय में बनी रही। 1837 में तत्कालीन कमिश्नर गोयन ने एक रिपोर्ट में लिखा है कि कुमाँऊ में दासता अनुवांशिक मालूम होती है, यह प्रथा अति प्राचीन काल से चली आई है। फलतः ब्रिटिश शासन के प्रथम 50 वर्षो में कोई भी ऐसा ग्राम पर्वतीय क्षेत्र में न था जिसमे एक- दो शिल्पकार परिवार दास के रूप में न हो। 1950 ई0 की जनगणना रिपोर्ट भी यह सिद्ध करती है की 85% शिल्पकार वर्ग के लोग कृषि पर निर्भर थे।
सुप्रसिद्ध विद्वान सर्वपल्ली राधा कृष्ण ने लिखा है कि " प्रत्येक समाज के इतिहास में एक समय आता है, जब उस समाज को शक्ति के रुप मे अपना अस्तित्व बनाये रखना हो और अपनी प्रगति को जारी रखना हो, सामाजिक व्यवस्था में कुछ परिवर्तन करना आवश्यक हो जाता है,यदि वे प्रयत्न करने में असमर्थ रहे,यदि उसकी शक्ति समाप्त हो चुकी हो,और उसका पुरुषार्थ निःशेष हो चुका हो,तो वह इतिहास के रंगमंच से बहार निकल जायेगा।2 और इससे भी अधिक उस समाज के लिए कठिनाइयां होती है जो इतिहास के रंगमंच से पहले से ही बाहर हो।" कुमायूँ गढ़वाल के शिल्पकार राजनैतिक अधिकारों से वंचित थे और उन्हे नागरिक अधिकार भी प्राप्त नही थे।वे परस्पर नातेदारी में स्वतंत्र नही थे। पिता-पुत्र या पति-पत्नी के झगड़ों में "बिठ " का हस्तक्षेप होता था।दो ग्रामो डोमो के मध्य संघर्ष का फैसला "बिठ" ही करवाते थे 3 उनके पास अपनी कोई पंचायत नही होती थी।4 अतः इन परिस्थितियों में अंग्रेजी राज्य पश्चिमी उदार सुधारवाद के संदर्भ में भारत मे जाति की चुनौती के प्रति हिन्दू समाज के पददलित अंग का उत्तर था अब्राह्मण आंदोलन।5 जिस प्रकार पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव से स्वर्ण जाति में स्वराज और स्वतंत्रता की भूख पैदा हुई,उसी तरह की शिक्षा के प्रभाव से दलितों की भी आंखे खुल गई, और वह भी अब अपने उन समस्त राजनैतिक, नागरिक, और सामाजिक अधिकारों को चाहने लगे थे 6 जो कि उनका भी जन्म सिद्ध अधिकार था। कुछ निम्न वर्ग के शिक्षितों की समंझ में आया कि बलवान जातियों के अत्याचार की वजह से उनकी कौम की यह दुर्दशा हुई है।
राष्ट्रीय चेतना में नव जागरण के बीज 19 वी शताब्दी के दूसरे दशक से अंकुरित होने लगे थे। सामाजिक आंदोलन का सूत्रपात करने में राजाराम मोहन राय सबसे अग्रणी थे। तदुपरान्त सभी दिशाओं में सुधारवादी आंदोलन का सूत्रपात होता चला गया। विकसित राष्ट्रीय चेतना से भारत का कोई भी क्षेत्र अछूता न रहा। इसकी गति 19 वी शताब्दी के अंतिम दशकों और 20 वी शताब्दी के पूर्वार्द्ध में और अधिक तीव्र होती चली गयी।
दलित समाज के प्रति शताब्दियों से अप्रजातांत्रिक तरीको का प्रयोग, भरतीय समाज की परम्परागत नीति बन कर रह गया था। ब्रिटिश शासन काल मे ब्राह्म्णवादी व्यवस्था के विरूद्ध समतावादी आंदोलन को जन्म देने वाले प्रथम व्यक्ति महात्मा ज्योतिबा फुले थे और इसे परिपक्व करने की दिशा में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की प्रमुख भूमिका रही। ये ऐसी विभूतियां थी, जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर दलित आक्रोश को संगठित किया।
इधर पश्चिमी विचारधारा का दलित वर्ग पर गहरा प्रभाव पड़ रहा था।उनमें पश्चिमीकरण दुगना वांछनीय हो गया , उसमें ऐसी भी वस्तुएँ सम्मलित थी, जो केवल अपने आप मे मूल्यवान थी,बल्कि उच्च जातियों के पास थी और उनके पास न थी। ऊँची जातियों के बराबर पहुँचने के लिए केवल संस्कृतिकरण पर्याप्त न था। सवर्णो की भांति पश्चिमी शिक्षा और नये पेशो में उच्च जातियों के प्रवेश ने पिछले वर्ग आंदोलन के लिए मुख्य सेतु प्रस्तुत कर दिया।7 इसी सन्दर्भ में उत्तराखंड में शिल्पकारों के उत्थान के लिए सर्वप्रथम सभा का गठन हुआ।
टम्टा सुधारक सभा (1905):-
सन1905 में अल्मोड़ा में टम्टा सुधारक सभा की स्थापना हुई। यह संस्था शुरुआत में, केवल अल्मोड़ा क्षेत्र के टम्टा जाति तक ही सीमित थी । कृष्ण चंद टम्टा को अध्यक्ष और हरि प्रसाद तमत को टम्टा सुधारक सभा का सचिव नियुक्त किया गया। इस एसोसिएशन का मुख्य उद्देश्य टम्टा जाति में सुधार के लिए प्रयास करना और समुदाय की प्रगति सुनिश्चित करने के अधिकारों की मांग करना है। वास्तव में यह दलित राजनीति में एक नया आयाम है क्योंकि व्यक्तिगत स्तर पर जाति को आवश्यकताओं को प्राप्त करने के लिए सामूहिक कार्रवाई की आवश्यकता के बारे में पता चला।8
इस सभा के निम्नलिखित उद्देश्य थे:-
1 अंग्रेजों ने भारत के लोगों को जो अनगिनत वरदान और आशीर्वाद दिए हैं, उनकी गणना करके उनकी सबसे महान महिमा के सिंहासन के प्रति समर्पण और वफादारी को मजबूत करने के लिए।
2. स्वच्छता के हित को बढ़ावा देने के लिए (a). धर्मनिरपेक्ष शिक्षा (b) कला और उद्योग ग. स्वच्छता और स्वच्छता सिद्धांत।
3. समुदाय में संयम और सामाजिक शुद्धता का प्रचार करना।
4. बर्तन और फर्नीचर के रूप में और समुदाय में सामाजिक और धार्मिक समारोहों के अवसरों पर आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध कराने में मदद करना।
5. मानसिक, नैतिक और औद्योगिक मामलों के विकास में समुदाय के हितों की देखभाल करना।
इस प्रकार टम्टा सुधार सभा ने सामूहिक कार्रवाई के लिए जाति के सदस्यों को लामबंद करके टम्टा जाति के समग्र विकास का वादा किया। इस संघ का मुख्य उद्देश्य जाति के सदस्यों को संभावित सहायता प्रदान करके अपनी जाति की स्थिति को ऊँचा उठाना था। 1910 ई0 के बाद प्रत्येक जाती अपनी स्थिति को ऊँचा उठाने लगी थी। उन्होंने अपने सदस्यों की सभाएं निमंत्रित की और इस कदम उठाने के लिये पार्षदों के निर्माण किया ताकि उनकी प्रास्थिति को इस ढंग से प्रस्तुत किया जाए जिसे वे अपने लिए आदरणीय समझे।9
इसी समय सन 1905 में ही गढ़वाल यूनियन तथा गढ़वाल पत्र से जुड़े तारादत्त गैरोला ने गढ़वाल के ब्राह्मणों के एक छोटे हिस्से का प्रतिनिधित्व करने वाली गैरोला सभा की स्थापना की। इस सभा का मुख्यालय टिहरी में था। इसको शुभ चिंतकों के महाराजा और राजपरिवार के सदस्य थे। बद्रीनाथ के रावल इसके सभा पति थे। इस प्रकार उत्तराखंड में जातिगत आधार पर पहली बार दो सभाओं का उदय हुआ, एक सवर्ण जाती की और दूसरी अंत्यज जाती की।10
गढ़वाल में गैरोला सभा ( सैरोला सभा) के बाद गढ़वाल यूनियन और फिर गढ़वाल मात्रमण्डल का गठन हुआ। जिन्हें आगे चलकर गढ़वाल सभा ने अपने मे मिला लिया ।परंतु ये सभी सभाएं सवर्ण जातियों की थी। गढ़वाल के शिल्पकारों को इसमें प्रवेश नही मिला। अतः पर्वतीय क्षेत्र में टम्टा सुधारक सभा ने प्रारम्भ में शिल्पकार वर्ग के स्तर को ऊँचा उठाने के लिए सभा के विस्तार का निर्णय लिया।
शिल्पकार सभा का उदभव:-
जातियों में तीव्रतर आत्मचेतना और जाति सभाओं की स्थापना के परिणाम स्वरूप जातियो के क्षैतिज प्रसार में वृद्धि में प्रवृत्ति पायीं जाती हैं। सन 1905 से लेकर 1911 ई0 तक यह टम्टा सुधारक सभा अपने संगठन में ही व्यस्त रही और छुट-पुट कार्य करती रही।लेकिन सन 1911 ई0 में शाही दरबार से सम्बंधित घटना ने एक नया इन्कलाब पैदा कर दिया।11 शिल्पकार सामाजिक रूप से अन्त्यज, आर्थिक दृष्टि से विपन्न और राजनैतिक दृष्टि से उच्च जातियों के दास बनकर रह गए थे,परन्तु अब आत्मस्वाभिमान का सूर्य उदित होने लगा था और उत्पीड़न के बादल छटने लगे थे। हरि प्रसाद टम्टा ने सं 1912 ई0 में टम्टा सुधाकर सभा का विस्तारीकरण करके इसे सम्पूर्ण पार्वतीय शिल्पकारों की सभा के रूप में संगठित कर दिया।12
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सन 1913 में लाला लाजपत राय को आमंत्रित करके दौलतराम व उनके पुत्र खुशीराम ने शिल्पकार सुधाराणी सभा का गठन किया।दोनों ही सभाओ के प्रारंभिक उद्देश्य एक जैसे थे। हालांकि आगे चलकर शिल्पकार सभा का झुकाव ब्रिटिश सरकार की ओर होता गया जबकि शिल्पकार सुधाराणी सभा आर्य समाज से प्रभावित होती चली गयी।13
1919 के अधिनियम के द्वारा प्रथम बार दलित वर्ग के अस्तित्व को पहचाना गया था। चौदह नोन ऑफिसियल मैम्बरो में जिनको गवर्नर जनरल ने केंद्रीय लेजिस्लेटिव असैम्बली के लिये मनोनित किया था,एक दलित प्रतिनिधि भी था। प्रान्तों में भी दलित जाति के प्रतिनिधि लिये गये।14
डोम “शब्द” का विरोध:-
1919 ई0 के पश्चात शिल्पकार सभा और शिल्पकार सुधाराणी सभा दोनो ही इस दिशा में सजग हो गई। इस समय उनका निशाना प्रचलित "डोम" था। कुमाँऊ, गढ़वाल में शिल्पकारों को 8वीं शताब्दी से कत्यूरी शासन काल तक डोम या डूम जैसे घृणित नमो से पुकारा जाता रहा। चंद व गोरखा तथा ब्रिटिश शासन की स्थापना के एक शताब्दी पश्चात भी इनमें कोई परिवर्तन नही आया। 1919 में हरी प्रसाद टम्टा, खुशीराम व गढ़वाल के बाबू बोधा सिंह तथा जयानंद भारतीय आदि शिल्पकार नेता इस शब्द का विरोध करने लगे। हरी प्रसाद टम्टा और खुशीराम द्वारा ब्रिटिश सरकार को प्रेषित कुछ ऐसे पत्र प्राप्त हुए हैं, जिनमे इस शब्द को समाप्त करने का निवेदन किया गया है।1920 ई0 को खुशीराम ने एक विस्तृत पत्र में तत्कालीन गवर्नर को पत्र लिखकर मांग की कि "डोम" शब्द मैदानी क्षेत्र की आपराधिक जान जातियों के लोगो के लिये प्रयुक्त होता है। अतः आगामी जनगणना में "डोम" शब्द को समाप्त कर दिया जाय और इसके स्थान पर शिल्पकार प्रयुक्त किया जाय। औऱ भारत सरकार के शिक्षा विभाग को भी इस संशोधन के लिये पत्र भेजा गया।15 सुपरिटेंडेंट ऑपरेशन संयुक्त प्रान्त के दिसम्बर 9 फरवरी1921 के पत्र में उन्होंने "डोम" (डूम) शब्द के स्थान पर "शूद्र" शब्द के प्रयोग की इच्छा व्यक्त की।16 सन 1931ई0 में शिल्पकार नेताओं के कड़े विरोध को देखते हुए ब्रिटिश जनगणना अधिकारियों ने पर्वतीय शिल्पकारो को लिये प्रयुक्त होने वाले डोम शब्द को समाप्त कर दिया। जनगणना में टिहरी और देहरादून के जिलों को छोड़ कर नैनीताल, अल्मोड़ा और गढ़वाल के शिल्पकारो को दो वर्गो में रखा गया हिन्दू या शिल्पकार जो प्राचीन मान्यताओं के अनुसार जीवन व्यतीत करते थे।अतः दलित नेताओं ने शिल्पकार व्यक्तियो के नाम के आगे राम,प्रसाद, लाल,और सिंह लगाया। शिल्पकार नेताओं के हस्तक्षेप से 1931 ई0 की जनगणना में उन्हें डोम के स्थान पर शिल्पकार लिखा गया।17 तथा 1947 ई0 से आर्य समाजी शिल्पकारो के नाम के आगे "आर्य" भी जोड़ा जाने लगा।
27 अगस्त 1925 ई0 में विराट कुमाँऊ शिल्पकार सम्मेलन अल्मोड़ा नगर से 14 किमी0 दूर "दयोली डाडा" जंगल मे आयोजित हुआ।पहले यह सम्मेलन अल्मोड़ा में नारायण तिवारी देवाल में होना था, पर सवर्णो के विरोध के कारण इसको "दयोली डाडा" में आयोजित किया गया। इसकी अध्यक्षता मुंशी हरि प्रसाद टम्टा ने की। श्री हरिराम मंत्री और श्री बच्ची राम उपमंत्री थे। इस सम्मेलन को सफल बनाने के लिए गढ़वाल, कुमाँऊ के ग्रामीण क्षेत्रों के हजारों शिल्पकार अल्मोड़ा आये।फलतः बाबूराम प्रसाद टम्टा ने "शक्ति" अंक को परिवाद भेजा कि 7400 की उपस्थिति तो जुलूस से पहले ही रजिस्टर में दर्ज हो चुकी थी 18 इस सम्मेलन में शिल्पकारों की अनेक समस्याओं को उठाया गया।
1925 ई0 नवंबर माह में हरी प्रसाद टम्टा, खुशीराम और बचीराम के नेतृत्व में अल्मोड़ा नगर के नारायण टेवाड़ी देवाल नामक स्थान पर एक शिल्पकार सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन का उद्देश्य द्विजो के शिल्पकारो पर अत्याचार का विरोध, उसके प्रतिकार के उपाय और शिल्पकारो में भातृत्व भाव की वृद्धि और शिल्पकारो के जमीन से संबंधी कष्टो को हल करने संबंधी तथ्यो पर विचार किया गया।19
यहाँ पर यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि जातिगत विद्वेष और छुआ-छूत की समस्या के अतिरिक्त अब शिल्पकार नेताओ को भूमिहीन शिल्पकारो की आर्थिक उन्नति की चिंता भी होने लगी थी।शिल्पकार सभा ने अपने1926 ई0के वार्षिक अधिवेशन में शिल्पकारो द्वारा निर्मित वस्तुओं की प्रदर्शनी लगाने का निर्णय लिया।इन अधिवेशनों में शिल्पकार जाग्रति की तीन प्रमुख धाराओं के प्रतिनिधि यथा हरि प्रसाद टम्टा, खुशीराम और बचीराम सामूहिक रूप से शामिल हुए थे। देवीधुरा में 21 से 23 अगस्त1926 ई0 तक शिल्पकार सभा मे आर्थिक उन्नति संबंधी पक्ष पर व्यापक बहस हुई तथा विभिन्न कार्यक्रम प्रस्तुत किये गए।
शक्ति साप्ताहिक 20 जुलाई 1926 ई0 के अंक में प्रकाशित "शिल्पकारो में जागृती" नामक लेख सूचित करता है कि शिल्पकारो के आंदोलन को उठे 14 वर्ष हो गए है। जागृति हो चुकी है, अब नियमित कार्य की आवश्यकता है। 14 जुलाई को " सुरमने " में कुछ शिल्पकार सज्जनों की सभा मे एक शिल्पकार विद्योगी संस्था खोलने का निश्चय हुआ है। इस संस्था में बालको को सादगी से ताना, कातना, बुनना, बढ़ई, दर्जी,तथा लुहार का काम सिखाया गया।20 इस विद्यालय का नाम दयानन्द शिल्प विद्यालय रखा गया।भूमिमित्र आर्य को इसका प्रधान बनाया गया।
23 अगस्त 1928 ई0 को शिल्पकार सभा का एक अधिवेशन देवीधूरा में भाठ खुशीराम मेम्बर डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के सभापतित्व में संम्पन्न हुआ। इस सम्मेलन में ब्रिटिश राज्य के प्रति भक्ति का प्रदर्शन किया गया, साथ ही साथ इसमे भूमिहीनों को जंगलात से भूमि दिलाने और सार्वजनिक संस्थाओं में शिल्पकारो को छोटे -छोटे ठेके देने की सरकार से अपील की गई। देवीधुरा के 1930 ई0 के सम्मेलन में शिल्पकार सभा ने जहां शिल्पकारो की शिक्षा के लिए जारी तालीम ग्रान्ट को दुगनी करने पर जोर दिया वही दूसरी ओर गाँधी जी द्वारा प्रारम्भ सविनय अवज्ञा आंदोलन में शिल्पकारो की भागीदारी को रोकने हेतु प्रस्ताव पारित किया गया। गढ़वाल शिल्पकार सम्मेलन 1931 ई0 में निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किये गये—
1. गढ़वाल शिल्पकार सम्मेलन स्वम् को शिल्पकार सभा से जोड़ता है।
2. सभा का अधिवेशन प्रति वर्ष डोगड्डा में होगा।
3. यह सम्मेलन न्याय प्रिय सरकार से विनय करता है कि अछूत कहलाने वाले शिल्पकारो के हितो की रक्षा के लिए हमारी संख्या के अनुरूप हमे भी मुसलमान व सिक्खों के समान कौंसिल, एसेम्बली, जिलापरिषद, व नगरपालिकाओं में प्रतिनिधित्व दिया जाय।
4. जिलापरिषद व गढ़वाल में शिल्पकार मेम्बर व सुपरवाइजर की नियुक्ति की जाय।
5. निर्धन शिल्पकारो को रिजर्व जंगलात व सिविल जंगलात से ऐसी भूमि दी जाये जो खेती योग्य हो।
6. सेना हेतु शिल्पकारों की एक पृथक बटालियन बनाई जाय।
7. चूँकि शिल्पकार निर्धन व दुर्बल है अतः द्विजो से परस्पर विवाद होने पर ध्यानपूर्वक विचार किया जाय।21
राष्ट्रीय मंच में दलित--
इस समय भरतीय राष्ट्रीय आंदोलन राजनैतिक सुधारों के साथ ही सामाजिक सुधारो को भी अपना चुका था। दलितों की राजनैतिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण हो चुकी थी अतः दलितों को हिन्दू समाज मे सम्मलित करने के लिए व्यापक कार्यक्रम संचालित हो रहे थे। दलितों के मंदिर प्रवेश संबंधित बिल और अश्पृश्यता निवारण बिल कौंसिल के सम्मुख रखे जा चुके थे । अतः खुशीराम के नेतृत्व में शिल्पकारों के एक सम्मेलन ने 12,13, व 14 फरवरी1 1934 ई0 को सर्वसम्मति निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किये----
1. सरकार मंदिर प्रवेश बिल स्वीकार करे।
2. राजा मुंजे द्वारा रखे गए अश्पृश्यता निवारण बिल को स्वीकार किया जाय।
3. सरकार को नगरपालिका, स्थानीय निकाय,व जिलापरिषदो में शिल्पकार जनता से उनकी संख्यानुसार सदस्य व पंच निर्वाचित करने की व्यवस्था करे।
शिल्पकार सभा और शिक्षा---
1815 ई0 1920 तक का काल कुमाँऊनी शिल्पकारों की शिक्षा के इतिहास में अंधकारपूर्ण का था । वे अनपढ, अशिक्षित थे। ब्रिटिश लोग अपने साथ जातिविहीन संस्कृति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से भरा साहित्य लाये। 22उन्होंने ऐसी शिक्षा प्रणाली का सूत्रपात किया जो निष्पक्ष थी। ईसाई मिशनरियों ने प्रत्येक धर्म व जाती के बच्चों को जिनमे अछूत भी थे प्रवेश दिया।23
हरि प्रसाद टम्टा बदली हुई परिस्थितियों में शिल्पकार वर्ग की शिक्षा के प्रति गम्भीरता से विचार कर रहे थे। सर्वप्रथम बालकों के लिये "कृष्ण डे स्कूल" और बुजुर्गो के लिये " कृष्ण नाईट स्कूल" राजपुर अल्मोड़ा में खोले गये। सन 1932 ई0 शिल्पकार सभा द्वारा संचालित स्कूलों की संख्या निरंतर बढ़ती गयी। सरकार द्वारा गठित डिप्रेस्ड क्लास एजुकेशन इस कार्य मे शिल्पकार सभा को सहायता दे रही थी। शिल्पकार सभा और ब्रिटिश सरकार की नीति मिले-जुले प्रयासो के अच्छे परिणाम निकलने लगे थे।अगामी वर्षों में शिल्पकार वर्ग में चेतना का संचार होने लगा।
शिल्पकार सभा का प्रस्ताव (1939):-
सन 1939 ई0 में शिल्पकार सभा ने शिक्षा हेतु निम्नलिखित प्रस्ताव प्रस्तुत किये --
1. ग्रामीण अंचलों में स्कूल भवन निर्मित किये जायें।
2. मिडिल पास शिल्पकार युवाओं को रोजगार मिले.
3. शिल्पकार सभा द्वारा विभिन्न स्थानों पर खोले गए 8 पुस्तकालयो को सरकारी अनुदान मिले।
4. कुमाँऊ शिल्पकार सभा ने जो 60 प्रौढ़ पाठशालायें व 20 दैनिक स्कूल खोले है, उन्हें सरकार अनुदान दे।
5. जिला परिषद में स्कूलो में शिल्पकार छात्रों की फीस माफ् की जाय।
6. जिले में एक शिल्पकार व्यक्ति सब डिप्टी इंस्पेक्टर नियुक्त किया जाय।
9 जनवरी 1941 ई0 के0 शिल्पकार अध्यापक सम्मेलन में भी इसी प्रकार की मांगों को दोहराया था।24 इसी वर्ष शिल्पकार छात्र-छत्राओ की फीस माफ् कर दी गयी।25
कुमाँऊ शिल्पकार नेता सम्मेलन (1947):-
19-20 मई 1947 ई0 को रिंक हॉल नैनीताल में खुशीराम की अध्यक्षता में सम्मेलन संम्पन हुआ। इसमे संयुक्त प्रान्त के माननीय सेक्रेटरी और विधायक तथा विधान परिषद के नेता भी सम्मिलित हए।सम्मेलन में कुमाँऊ के प्रतिष्ठित नेता पंडित हरगोविंद पंत विधायक, राय साहब जगन्नाथ पाण्डेय चैयरमैन, जिला परिषद नैनीताल व गढ़वाल के प्रसिद्ध शिल्पकार नेता जयनन्द भरतीय भी उपस्थित थे। इस सम्मेलन के मुख्य प्रस्ताव निम्नलिखित थे--
1 यह सम्मेलन हल्द्वानी शिल्पकार सम्मेलन के प्रस्तावों का अनुमोदन करता है।
2 यह कॉन्फ्रेंस ब्रिटिश प्रधानमंत्री तथा हिज एक्सीलेंसी वायसराय का ध्यान इस और आकर्षित करता है कि कुमाँऊ की शिल्पकार जाती ने सन 1914 ई0 और 1939 से 1945 ई0 तक संसार की लड़ाई में वीरता का परिचय दिया है।अतः यह कॉन्फ्रेंस अनुरोध करती हैं कि कुमाँऊ कमिशनरी के शिल्पकारो की एक शिल्पकार राइफल्स बटालियन बनाई जाय,जिससे शिल्पकार जाति उत्साहित होकर शक्तिशाली बन सके।
3. कॉन्फ्रेंस संयुक्त प्रान्त सरकार का ध्यान इस और आकर्षित करती है कि कुमाँऊ के शिल्पकारों में ग्रेजुएट व अंडर ग्रेजुएट युवक है, पर उन्हें डिप्टी कलेक्टर व डी0एस0पी0 इत्यादि उच्च पदों पर नियुक्ति नही किया गया।अतः सम्मेलन इस पर असंतोष व्यक्त करता है।
4. श्री खुशीराम द्वारा प्रस्तावित भूमिहीन योजना शीघ्रता से लागू की जाय।
5. मोटर मार्ग निर्माण कार्य में बाहरी मजदूरों की अपेक्षा स्थानीय दलितों को प्राथमिकता दी जाय
6. नगरपालिका नैनीताल शिल्पकारो को भी भूमि आवंटित करे।
7. सरकारी पदों हेतु कुमाँऊ दलित वर्ग को निर्धारित योग्यता से मुक्त रखा जाय।
यह सम्मेलन स्वतंत्रता से कुछ ही दिन पहले सम्पन्न हुआ। इसमें शिल्पकारों की आर्थिक उन्नति हेतु ब्रिटिश सरकार से शिल्पकार राइफल्स बटालियन के गठन का अनुरोध इस बात का संकेत देता है कि शिल्पकारों में आर्थिक उत्थान की उत्कंठा अत्यंत प्रबल थी। इसके लिए वे ब्रिटिश या कांग्रेसी सभी सरकारो से निवेदन करने में नही हिचकिचा रहे थे।
15 अगस्त 1947 को देश आजाद हो गया। जहाँ से दलित उत्थान समस्या नई दिशा की ओर जाती हैं।
1925 ई0 से शिल्पकार सभाएं निरन्तर अपनी जातीय उन्नति के प्रयासों में लगी रही। उन्होंने शिक्षा, आर्थिक,अस्पृश्यता, और विद्यार्थी समस्याओं के विरुद्ध जनाक्रोश को ही संगठित नही किया वरन उनके समाधान के लिये सक्रिय प्रयास भी किये।इनमें कुमाँऊ गढ़वाल की दलित सभाओ को अत्यधिक सफलताएँ मिली, जहाँ उन्होंने अपने प्रयासों से ब्रिटिश प्रशासकों की सहानुभूति प्राप्त की वही दूसरी और राष्टवादी नेताओं को भी अपने समीप एकत्रित किया। 15 अगस्त1947 ई0 को देश की स्वतंत्रता के साथ दलतोत्थान समस्या नई दिशा की ओर प्रवेश करती
REFERANCE:-
1 वियोगी,डॉ नवल तथा अंसारी,डॉ एम. अनवर , उत्तरापथ के नाग शासक तथा शिल्पकार आंदोलन का इतिहास, अकादमी ऑफ लिटरेचर एंड कल्चर, लुधियाना,2010.
2 Ibid.
3 सर्वपल्ली,राधा कृष्ण, धर्म और समाज, राजपाल एंड सन्स, नई दिल्ली, पृष्ठ 222
4 सनवाल, अर0डी0, सोशल स्ट्रेटिफिकेशन इन रुरल कुमाँऊ, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस,दिल्ली,1976,पृष्ठ63
5 Ibid.
6. श्री निवास, एम0एन0, आधुनिक भारत में जातिवाद तथा अन्य निबन्ध, भोपाल,पृष्ठ 22।
7. अप्रिय सत्य, प्रकाशन प्रधान जिला, आदि हिन्दू महासभा कानपुर,1932,( मैगजीन)।
8. श्री निवास, एम0एन0, आधुनिक भारत में सामाजिक परिवर्तन, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1995,पृष्ठ 87.
9. गढ़वाल महा महेन्द्रानुमोदित सरौल सभा के नियम-1905.
10. धुरये गोविन्द, सदाशिव, जाति वर्ग और व्यवसाय,राजपाल एंड सन्स, नई दिल्ली, पृष्ठ 279.
11. समता, मई 1935(न्यूज़ पेपर) ।
12. जिज्ञासु, चंद्रिका प्रसाद, दलित सुमनंजली, अल्मोड़ा, 1934 ।
13. खुशीराम की डायरी से उद्वत।
14. भटनागर, राजेन्द्र मोहन, डॉ आंबेडकर जीवन और दर्शन, किताबघर, दिल्ली, 1982,पृष्ठ 48।
15. डिपार्टमेंट ऑफ एडजुकेशन (सेंसेस) गवर्नमेंट ऑफ इंडिया का पत्र, 2 फरवरी 1921।
16. ई0एच0एडली, सुपरिटेंडेंट सेंसेस ऑपरेशन के पत्र,9 फरवरी 1921।
17. सेंसेस ऑफ़ इंडिया, 1931, यू0पी0 रिपोर्ट पृष्ठ 538।
18. शक्ति, अक्टूबर, 13, 1925 (न्यूज पेपर) ।
19. शक्ति, नवम्बर, 1925.
20. शक्ति, अगस्त, 10, 1926
21.शक्ति, नवम्बर,7, 1931.
22. धुरये गोविन्द, सदाशिव, जाति वर्ग और व्यवसाय,राजपाल एंड सन्स, नई दिल्ली, पृष्ठ 173.
23. Ibid, वियोगी,डॉ नवल तथा अंसारी,डॉ एम. अनवर.
24 समता, जनवरी, 15, 1941।
25. समता, सितम्बर, 17, 1941
IN ENGLISH
1 Viyogi, Dr. Naval and Ansari, Dr. M. Anwar, History of the Naga Rulers of Uttarapath and the Craftsmen Movement, Academy of Literature and Culture, Ludhiana, 2010.
2 Ibid.
3 Sarvepalli, Radha Krishna, Religion and Society, Rajpal and Sons, New Delhi, p. 222
4 Sanwal, Ar.D., Social Stratification in Rural Kumaon, Oxford University Press, Delhi, 1976, p.63
5 Ibid.
6. Shri Niwas, M.N., Casteism and Other Essays in Modern India, Bhopal, p. 22.
7. Unpleasant Truth, Publication Head District, Adi Hindu Mahasabha Kanpur, 1932, (Magazine).
8. Shri Niwas, M.N., Social Change in Modern India, Rajkamal Publications, New Delhi, 1995, p 87.
9. Rules of the Garhwal Maha Mahendra-approved Saroul Sabha, 1905.
10. Dhurye Govind, Sadashiv, Caste, Class and Occupation, Rajpal and Sons, New Delhi, p. 279.
11. Samta, May 1935 (News Paper).
12. Jigyasu, Chandrika Prasad, Dalit Sumanjali, Almora, 1934.
13. Quoted from Khushiram's diary.
14. Bhatnagar, Rajendra Mohan, Dr. Ambedkar Life and Philosophy, Bookhouse, Delhi, 1982, p. 48.
15. Letter from the Department of Education (Senses) Government of India, 2 February 1921.
16. Letters from E.H.Adley, Superintendent Census Operation, 9 February 1921.
17. Senses of India, 1931, U.P. Report p. 538.
18. Shakti, October 13, 1925 (news paper).
19. Shakti, November, 1925.
20. Shakti, August 10, 1926
21.Shakti, November 7, 1931.
22. Dhurye Govind, Sadashiv, Caste, Class and Occupation, Rajpal and Sons, New Delhi, p. 173.
23. Ibid, Viyogi, Dr. Naval and Ansari, Dr. M. Anwar.
24 Samata, January 15, 1941.
25. Samata, September 17, 1941
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